ऑपरेशन सिंदूर: शौर्य की हुंकार या राजनीतिक तमाशा?


28 जुलाई को जब संसद में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की जानकारी दे रहे थे, उसी दिन भारतीय सेना ने पहलगाम आतंकी हमले के मास्टरमाइंड समेत तीन आतंकवादियों को मार गिराया। यह ऑपरेशन न केवल भारत की आत्मरक्षा का प्रमाण बना बल्कि सैन्य साहस, सटीक रणनीति और संप्रभुता की स्पष्ट घोषणा भी।

हालांकि, देश और दुनिया ने जिस सैन्य अभियान को आतंकवाद पर निर्णायक वार के रूप में देखा, वही ‘ऑपरेशन सिंदूर’ अब दुर्भाग्यवश राजनीतिक बयानबाज़ी का शिकार हो गया है। कांग्रेस सांसद प्रणीति शिंदे द्वारा इस अभियान को “तमाशा” कहे जाने के बाद विवाद गहराता गया।

सेना के पराक्रम पर सवाल क्यों?

देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे सैनिक -43 डिग्री सेल्सियस तापमान में मोर्चे पर डटे रहते हैं। उनके साहस पर सवाल उठाना क्या राष्ट्र के प्रति अवमानना नहीं है? विपक्ष के मौन और विरोधाभासी रवैये ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या राजनीतिक असहमति अब राष्ट्रीय सुरक्षा तक को लांघ चुकी है?

ऑपरेशन सिंदूर की सफलता

22 अप्रैल के पहलगाम आतंकी हमले के बाद सेना द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई में 100 से अधिक आतंकियों का सफाया किया गया। 9 आतंकी ठिकाने नष्ट किए गए, वो भी बिना किसी नागरिक हानि के। यह किसी भी सैन्य कार्रवाई की सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है। बावजूद इसके, कुछ राजनीतिक दल इसे “राजनीतिक स्टंट” कहने से नहीं चूके।

राजनीति में पाकिस्तान को राहत?

गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि मारे गए आतंकियों के पास से पाकिस्तानी वोटर कार्ड और हथियार मिले। इसके बावजूद, विपक्ष के कुछ नेताओं ने आतंकियों को “स्थानीय” बता कर पाकिस्तान की भूमिका को हल्का करने की कोशिश की। पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम का यह रुख, न सिर्फ भारतीय एजेंसियों के प्रति अविश्वास दर्शाता है, बल्कि सुरक्षा नीति को भी प्रभावित कर सकता है।

क्या यह नया चलन है?

जब सरकार जवाब दे, तब भी सवाल उठाना — यह कोई नई बात नहीं। जब संसद में ऑपरेशन की जानकारी दी गई, तब भी कुछ विपक्षी सांसदों ने बार-बार टोकते हुए बहस को भटकाने का प्रयास किया। क्या भारत की सैन्य कार्रवाई अब विदेशी समर्थन या विपक्ष की अनुमति पर निर्भर होनी चाहिए?

राष्ट्रवाद बनाम राजनीति

गृह मंत्री का यह सवाल कि “जब आतंकी मारे जाते हैं तो आपके चेहरों पर उदासी क्यों होती है?” सीधे तौर पर उस मानसिकता पर प्रहार करता है, जो आतंकवाद पर चुप्पी साधे रहती है लेकिन सेना पर संदेह प्रकट करती है।

देश की अस्मिता का सवाल

ऑपरेशन सिंदूर न केवल एक सैन्य कार्रवाई है, बल्कि यह उस वैचारिक संघर्ष का प्रतीक भी है जिसमें एक पक्ष राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा के साथ खड़ा है और दूसरा पक्ष आलोचना के नाम पर देश की छवि और सेना के मनोबल को नुकसान पहुंचाता है।

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