विचार प्रवाह – क्या मोहन भागवत संघ की छवि को धर्मनिरपेक्ष बनाने का प्रयास कर रहे हैं?

राम मंदिर आंदोलन को घर-घर का आंदोलन बनाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने अनुषांगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद को इस मुहिम में पूरी ताकत के साथ उतारा था और भारतीय जनता पार्टी को इसे देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बनाने में भरपूर सहयोग दिया था।

अब वही संघ, जिसके सरसंघचालक मोहन भागवत हैं, इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हर मस्जिद के नीचे मंदिर तलाशने की मुहिम बंद होनी चाहिए। उनका कहना है कि कुछ नेता मंदिर-मस्जिद के विवाद को उठाकर केवल हिंदुओं के बड़े नेता बनने की कोशिश कर रहे हैं।

पिछले कुछ महीनों में संघ प्रमुख के इस तरह के बयान लगातार चर्चा में हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या मोहन भागवत संघ की छवि को धर्मनिरपेक्ष बनाने का प्रयास कर रहे हैं? क्या वे संघ को एक ऐसा स्वरूप देना चाहते हैं, जो हिंदुओं के साथ-साथ देश में रहने वाले मुसलमानों और ईसाइयों को भी अपनापन महसूस कराए?

संघ के पुराने समर्थकों और भाजपा के नए सोशल मीडिया समर्थकों के लिए यह स्टैंड अनोखा और अप्रत्याशित लग सकता है। सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ लोग उनकी आलोचना करते हुए भी नजर आते हैं।

लेकिन संघ की राजनीति को लंबे समय से समझने वाले विश्लेषकों का मानना है कि यह पहली बार नहीं है जब संघ अपनी छवि बदलने का प्रयास कर रहा है।

संघ में छवि परिवर्तन का इतिहास

1990 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी की जोड़ी के साथ भाजपा का उदय हुआ। इसी दौरान संघ के चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया के कार्यकाल में यह चर्चा शुरू हुई कि भाजपा को देश की मुख्यधारा की पार्टी बनाना है तो सभी धर्मों को साथ लेकर चलना होगा।

इसके बाद संघ के पांचवें सरसंघचालक केएस सुदर्शन ने 2002 में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का गठन कराया। इस मंच का उद्देश्य मुस्लिम समाज को संघ के साथ जोड़ना था। मंच की जिम्मेदारी इंद्रेश कुमार को दी गई, जो पिछले 22 वर्षों से इस कार्य में लगे हुए हैं।

हालांकि, इस प्रयास से अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण अब ऐसा लगता है कि मोहन भागवत ने खुद इस मोर्चे को संभालने का फैसला किया है।

राम मंदिर निर्माण के बाद बदले समीकरण

राम मंदिर का निर्माण अयोध्या में हो चुका है। काशी और मथुरा के मुद्दों पर भी वैसा विवाद नहीं दिख रहा जैसा कभी अयोध्या के मामले में था। इन बदले हुए हालात में संघ प्रमुख का मानना है कि यह संघ की छवि को बदलने का सही समय है।

लेकिन यह बदलाव संघ और भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। भाजपा के भीतर और बाहर दोनों मोर्चों पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा के वे कार्यकर्ता जो राम मंदिर के मुद्दे पर पार्टी से जुड़े थे, और हिंदू समुदाय के वे वर्ग जो संघ के मुस्लिम समुदाय के साथ संवाद को लेकर सवाल उठा रहे हैं, दोनों ही मोहन भागवत की इस नई दिशा पर असंतोष जता रहे हैं।

संघ प्रमुख की दोहरी चुनौती

मोहन भागवत को एक ओर भाजपा और उसके समर्थकों के साथ संवाद करना होगा, तो दूसरी ओर उन हिंदुओं का विश्वास भी जीतना होगा, जिन्हें संघ की इस नई पहल पर संदेह है।

संघ के लिए यह प्रयास केवल एक संगठनात्मक बदलाव नहीं है, बल्कि यह भारत के बहुलतावादी समाज के साथ अपने रिश्ते को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास है। समय बताएगा कि मोहन भागवत का यह प्रयास संघ और भारतीय राजनीति में कितना सफल होता है।

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