अधिवक्ता का बयान: दहेज मामलों में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइनों का हो रहा उल्लंघन
“सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन का अनुपालन नहीं, अधिवक्ताओं ने उठाए सवाल”
अधिवक्ता विकास तिवारी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन, जो “रजनीश बनाम नेहा” के मामले में दी गई थी, का पालन नहीं हो रहा है। गाइडलाइन के अनुसार, सभी पक्षकारों को अपनी आय, सेविंग अकाउंट, पिछले तीन साल के बैंक ट्रांजैक्शन, लोन आदि का संपूर्ण विवरण भरना आवश्यक है।
विकास तिवारी ने बताया कि पति और पत्नी दोनों पक्षों को हलफनामा देना होता है, लेकिन गलत हलफनामा या झूठे बयान साबित होने पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं होती। गाइडलाइन के तहत जारी 32 पेज के प्रोफार्मा की बजाय केवल चार पेज का प्रोफार्मा भरा जाता है, जिससे मुकदमों में गाइडलाइन का सही अनुपालन नहीं हो पाता।
उन्होंने उदाहरण दिया कि अतुल वाले मामले में पति-पत्नी दोनों कमाने वाले थे, इसलिए दोनों को बच्चों के भरण-पोषण में बराबर का योगदान देने का आदेश होना चाहिए था।
पुरुष उत्पीड़न के कानून की कमी
अधिवक्ता ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा कि महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने के लिए कई कानून बनाए गए हैं, लेकिन पुरुषों के उत्पीड़न के लिए कोई प्रावधान नहीं है। अगर कोई महिला किसी अन्य व्यक्ति के साथ भाग जाती है या गलत संबंध बनाती है, तो उसे दंडित करने के संबंध में कोई विशेष कानून नहीं है। उन्होंने बताया कि जारता संबंधी प्रावधान भी समाप्त कर दिया गया है, जिससे कानून का संतुलन बिगड़ता नजर आ रहा है।
निष्कर्ष: अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइनों के अनुपालन में हो रही अनियमितताओं और पुरुषों के लिए कानूनी प्रावधानों की कमी को लेकर चिंता जताई है।
