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राष्ट्रपति और राज्यपाल को समय सीमा में बाँधना संविधान के विरुद्ध: केंद्र

राष्ट्रपति और राज्यपालों की विधेयकों पर निर्णय की समयसीमा तय करने पर केन्द्र का सुप्रीम कोर्ट में जवाब

राष्ट्रपति की ओर से सुप्रीम कोर्ट को भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर केन्द्र सरकार ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है। यह मामला राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने की समय सीमा तय करने से जुड़ा है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि न्यायपालिका द्वारा समयसीमा निर्धारित करना संविधान के खिलाफ होगा। केन्द्र का तर्क है कि ऐसा करने से संवैधानिक अव्यवस्था पैदा होगी, जो संविधान निर्माताओं की मूल भावना के विरुद्ध है।

सरकार ने अपने जवाब में कहा कि अनुच्छेद 200 और 201 के तहत किसी भी समय-सीमा का उल्लेख नहीं किया गया है। संविधान ने जानबूझकर राज्यपाल और राष्ट्रपति को लचीलेपन के साथ परिस्थितियों के अनुसार विवेकाधिकार का प्रयोग करने का अवसर दिया है। यदि इसमें कृत्रिम रूप से समय सीमा जोड़ी जाती है तो यह संविधान निर्माताओं की मंशा को ठुकराने जैसा होगा।

इसके अलावा केन्द्र ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार नहीं है कि वह संवैधानिक प्रावधानों को दरकिनार कर दे। सर्वोच्च न्यायालय भी संविधान के दायरे और सिद्धांतों से बंधा हुआ है।

सरकार ने यह भी कहा कि यदि संविधान के किसी एक अंग की कथित विफलता के कारण दूसरे अंग को अतिरिक्त शक्तियां दे दी जाएं तो इससे संवैधानिक अव्यवस्था उत्पन्न होगी, जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने नहीं की थी।

गौरतलब है कि तमिलनाडु सरकार ने राज्यपाल द्वारा कई विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पारदीवाला की अध्यक्षता वाली बेंच ने राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर निर्णय की अधिकतम समयसीमा तय कर दी थी।

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