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प्रयागराज में धूमधाम से मनाया जा रहा देवउठनी एकादशी स्नान पर्व a

“तीर्थराज प्रयाग के यमुना नदी के तट पर बलवा घाट पर आज देवउठनी एकादशी स्नान पर्व आस्था के साथ मनाया जा रहा है। आज ही के दिन तुलसी जी का विवाह भी हुआ था। बड़ी संख्या में महिलाएं पूजा अर्चना और गीत गाकर माता तुलसी का विवाह कर रही हैं”

आज, तीर्थराज प्रयाग में यमुना नदी के तट स्थित बलवा घाट पर देवउठनी एकादशी का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि आज ही के दिन माता तुलसी का विवाह हुआ था, जो एक हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ महत्वपूर्ण अवसर है।

देवउठनी एकादशी का महत्व

देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। यह दिन भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने का दिन माना जाता है, जिसके बाद सभी धार्मिक गतिविधियाँ शुरू होती हैं। इस दिन का संबंध विशेष रूप से व्रत और स्नान से है, जो श्रद्धालु अपने पापों को धोने और पुण्य प्राप्ति के लिए करते हैं।

तुलसी विवाह

देवउठनी एकादशी के दिन माता तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम से होता है। यह विवाह एक अत्यधिक शुभ अवसर है, जिसे विशेष रूप से महिलाएं बड़े श्रद्धा भाव से मनाती हैं। आज के दिन, प्रयाग सहित अन्य स्थानों पर महिलाएं पूजा-अर्चना करती हैं, गीत गाती हैं, और माता तुलसी का विवाह धूमधाम से करती हैं। इसे एक धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व के रूप में मनाया जाता है, जो वैवाहिक सुख, समृद्धि और आस्था का प्रतीक है।

श्रद्धालुओं की भागीदारी

आज बलवा घाट पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हैं, जो स्नान करके धार्मिक अनुष्ठान में भाग ले रहे हैं। महिलाएं विशेष रूप से इस दिन को अत्यंत महत्वपूर्ण मानती हैं और माता तुलसी के विवाह का आयोजन घर-घर करती हैं। इसके साथ ही, वे इस अवसर पर विशेष पूजा विधियों का पालन करती हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

इस पर्व के दौरान, यमुना नदी के तट पर भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है, और आस्था का यह अद्भुत दृश्य किसी भी श्रद्धालु के मन को शांति और संतुष्टि प्रदान करता है।

निष्कर्ष

देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव है, जो आस्था, समृद्धि, और समाजिक एकता का प्रतीक है। प्रयाग में इसका आयोजन विशेष रूप से भावनात्मक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है, और यह पर्व हर वर्ष श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

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