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‘दिल्ली नहीं, ढाका’ नारा क्यों गूंज रहा है? बांग्लादेश की युवा पीढ़ी में भारत विरोधी भावना का उभार

‘दिल्ली नहीं, ढाका’: क्या बांग्लादेश की युवा पीढ़ी में भारत विरोध बढ़ रहा है?

बांग्लादेश की राजनीति में इन दिनों एक नारा तेज़ी से उभर रहा है— “दिल्ली नहीं, ढाका”। यह नारा सिर्फ़ दीवारों या पोस्टरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश की युवा पीढ़ी की बदलती राजनीतिक सोच को दर्शाता है। खासकर ऐसे समय में, जब देश में चुनाव होने जा रहे हैं और बड़ी संख्या में युवा पहली बार वोट डालने जा रहे हैं।

युवाओं के बीच यह धारणा मज़बूत हो रही है कि भारत ने लंबे समय तक बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में दख़ल दिया। शेख़ हसीना के शासन को दिल्ली का समर्थन, 2014 के बाद हुए विवादित चुनाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
इसी वजह से बांग्लादेश युवा भारत विरोध की भावना तेज़ हुई है।

कई छात्र और युवा कार्यकर्ता भारत को एक “हावी पड़ोसी” के रूप में देखते हैं। सीमा विवाद, पानी के बंटवारे की समस्याएं, व्यापार प्रतिबंध और भारतीय मीडिया की बयानबाज़ी ने इस सोच को और गहरा किया है। हालिया राजनीतिक हिंसा और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने भी युवाओं में नाराज़गी बढ़ाई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत-बांग्लादेश रिश्ते इस समय अपने सबसे निचले स्तर पर हैं। ऐसे में युवाओं का यह नारा आने वाले वर्षों में दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा दे सकता है।

यह विश्लेषण vishwashprakash | Amit kumar के लिए तैयार किया गया है।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

प्रश्न 1: ‘दिल्ली नहीं, ढाका’ नारा क्यों लोकप्रिय हो रहा है?
उत्तर: यह नारा बांग्लादेशी युवाओं की स्वतंत्र विदेश नीति और भारत के प्रभाव से दूरी की भावना को दर्शाता है।

प्रश्न 2: क्या यह पूरी तरह भारत विरोधी सोच है?
उत्तर: नहीं, यह ज़्यादातर राजनीतिक हस्तक्षेप और लोकतांत्रिक मुद्दों को लेकर असंतोष है।

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