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आदि तिरुवथिरई महोत्सव तमिलनाडु के गंगईकोंडा चोलपुरम में 23 से 27 जुलाई तक मनाया जाएगा

राजेंद्र चोल प्रथम की जयंती पर आदि तिरुवथिरई महोत्सव: चोल विरासत और तमिल संस्कृति का भव्य उत्सव


देश के संस्कृति मंत्रालय द्वारा महान चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम की जयंती को 23 से 27 जुलाई 2025 तक तमिलनाडु के गंगईकोंडा चोलपुरम में आयोजित आदि तिरुवथिरई महोत्सव के साथ मनाया जा रहा है। यह उत्सव न केवल चोल सम्राट की पौराणिक समुद्री यात्राओं के 1,000 वर्ष पूरे होने की याद दिलाता है, बल्कि प्रसिद्ध गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर के निर्माण का भी स्मरण करता है।

पांच दिवसीय इस महोत्सव के दौरान प्रत्येक संध्या कलाक्षेत्र फाउंडेशन के कलाकारों द्वारा भरतनाट्यम और दक्षिण क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के छात्रों द्वारा देवराम थिरुमुराई मंत्रोच्चार की प्रस्तुतियां होंगी। ये प्रदर्शनें चोल काल की समृद्ध आध्यात्मिक और कलात्मक परंपराओं को जीवंत करेंगी।

महोत्सव तमिल शैव भक्ति परंपरा और 63 नयनमार संतों की विरासत का उत्सव भी है। खास बात यह है कि सम्राट राजेंद्र चोल का जन्म नक्षत्र तिरुवथिरई (आर्द्रा) 23 जुलाई को ही आता है, जिससे इस वर्ष का आयोजन और भी खास बन गया है।

समापन समारोह 27 जुलाई को होगा, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि होंगे। उनके साथ तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि, केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और केंद्रीय मंत्री डॉ. एल. मुरुगन जैसे गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहेंगे। इस दिन विशेष भरतनाट्यम समूह गायन, देवराम भजनों की पुस्तिका का विमोचन और पद्म विभूषण इलैयाराजा की मंडली द्वारा संगीतमय प्रस्तुति होगी।

साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) मंदिर वास्तुकला और चोल शैव परंपरा पर विशेष प्रदर्शनियों और विरासत यात्राओं का आयोजन करेगा।

राजेंद्र चोल प्रथम (1014–1044 ई.) भारतीय इतिहास के सबसे प्रभावशाली सम्राटों में गिने जाते हैं। उन्होंने गंगईकोंडा चोलपुरम को अपनी राजधानी बनाया, जहां निर्मित मंदिर आज यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में विश्वप्रसिद्ध है। यह मंदिर चोल काल की मूर्ति शिल्प, कांस्य कला और प्रशासनिक दक्षता का प्रतीक है।

महोत्सव का उद्देश्य तमिल संस्कृति, शैव सिद्धांत, नयनमारों के योगदान, मंदिर वास्तुकला, शास्त्रीय कलाओं और साहित्य के क्षेत्र में चोल राजवंश की भूमिका को उजागर करना और सम्मानित करना है।

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