प्रतिनियुक्ति आदेश जारी करने से पहले कर्मचारी की सहमति आवश्यक
“प्रतिनियुक्ति आदेश पर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला: सहमति जरूरी“
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि प्रतिनियुक्ति आदेश जारी करने से पहले संबंधित कर्मचारी की सहमति लेना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि बिना सहमति के किसी भी कर्मचारी पर प्रतिनियुक्ति का आदेश थोपना नियमों के खिलाफ है।
दो सरकारी आदेशों पर रोक
न्यायमूर्ति ए.के. प्रसाद की सिंगल बेंच ने राज्य शासन के दो प्रतिनियुक्ति आदेशों पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 10 फरवरी को निर्धारित की गई है।
सीएमओ पदस्थापना को चुनौती
यह मामला कुम्हारी नगरपालिका में सीएमओ (मुख्य नगर पालिका अधिकारी) के पद पर हुई एक विवादित नियुक्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता एनआर चंद्राकर, जो वर्तमान में सीएमओ के पद पर पदस्थ हैं, ने अपने तबादले के आदेश को अदालत में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में कहा कि राज्य शासन ने नगरपालिका अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। उन्होंने बताया कि सहायक उप निरीक्षक (ASI) जैसे अधीनस्थ कर्मचारी को सीएमओ जैसे उच्च पद पर प्रतिनियुक्त करना नियमों के खिलाफ है।
प्रतिनियुक्ति नियमों का उल्लंघन
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि सहायक उप निरीक्षक का पद एक अधीनस्थ पद है और उसे सीएमओ जैसे प्रशासनिक पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार ने नियमों की अनदेखी करते हुए गैर-मानक प्रक्रिया अपनाई और अधीनस्थ कर्मचारी को प्रतिनियुक्त कर दिया।
अदालत का रुख और राज्य शासन को निर्देश
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कर्मचारियों की सहमति के बिना प्रतिनियुक्ति का आदेश न तो वैध है और न ही न्यायसंगत। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में राज्य सरकार को कानून के अनुरूप कार्य करना चाहिए।
इस फैसले के बाद राज्य सरकार के प्रतिनियुक्ति आदेशों को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। यह फैसला अन्य कर्मचारियों के लिए भी मिसाल बन सकता है जो बिना सहमति के प्रतिनियुक्ति आदेशों का सामना कर रहे हैं।
