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“बोफोर्स मामला: 1980 के दशक का विवाद फिर से खुलने की ओर“
1980 के दशक के बहुचर्चित बोफोर्स रिश्वत कांड का जिन्न एक बार फिर बाहर आता दिखाई दे रहा है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने इस मामले में अमेरिका को न्यायिक अनुरोध (लेटर रोगेटरी) भेजने की प्रक्रिया शुरू की है। यह पहल तब हुई जब अमेरिकी निजी जासूस माइकल हर्शमैन ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि उनके पास इस मामले से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी है जिसे वह भारतीय एजेंसियों के साथ साझा करने के इच्छुक हैं।
मामला क्या है?
1986 में भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी AB Bofors के बीच 1,437 करोड़ रुपये का सौदा हुआ था। इसके तहत भारतीय सेना को 155 MM होवित्जर तोपों की आपूर्ति की जानी थी। लेकिन 1987 में स्वीडिश रेडियो ने दावा किया कि इस सौदे में रिश्वत दी गई थी, जिसमें वरिष्ठ भारतीय राजनेता और अधिकारी शामिल थे। इस घोटाले ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की छवि को गहरा धक्का पहुंचाया और सरकार के खिलाफ विपक्ष ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया।
विवाद का पुनर्जीवन
- 2011 में मामला बंद कर दिया गया था, और राजीव गांधी सहित अन्य प्रमुख आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
- 13 साल बाद, CBI ने विशेष अदालत को सूचित किया कि वह जांच को फिर से खोलना चाहती है।
- माइकल हर्शमैन, जो फेयरफैक्स ग्रुप के प्रमुख हैं, ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ने घोटाले की जांच को जानबूझकर पटरी से उतार दिया था।
लेटर रोगेटरी क्या है?
लेटर रोगेटरी एक औपचारिक अदालती अनुरोध है, जिसे एक देश की अदालत दूसरे देश की अदालत को किसी आपराधिक जांच में मदद के लिए भेजती है। अमेरिका को यह अनुरोध भेजने में लगभग 90 दिन का समय लग सकता है।
केस का ऐतिहासिक घटनाक्रम
- 24 मार्च 1986: भारत और AB Bofors के बीच 1,437 करोड़ रुपये का सौदा।
- 16 अप्रैल 1987: स्वीडिश रेडियो ने रिश्वतखोरी का खुलासा किया।
- 6 अगस्त 1987: संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन।
- 26 दिसंबर 1989: वीपी सिंह की सरकार ने बोफोर्स पर पाबंदी लगाई।
- 22 जनवरी 1990: CBI ने आपराधिक मामला दर्ज किया।
- 2011: मामले को बंद किया गया और क्वात्रोकी समेत अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया।
- 1 नवंबर 2018: सुप्रीम कोर्ट ने मामले को फिर से खोलने की CBI की याचिका खारिज कर दी।
निष्कर्ष
बोफोर्स मामला भारत के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। अब जब CBI ने फिर से इस पर जांच शुरू करने के संकेत दिए हैं, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या माइकल हर्शमैन के दावों से इस केस में कोई नया मोड़ आएगा या यह मामला एक बार फिर राजनीतिक बहस का मुद्दा बनकर रह जाएगा।